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शहीदों के दिए स्वतंत्रता में सेंध ! _________

14-08-2021 09:23:41 PM


हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे , यह वर्ष 2021 का स्वतंत्रता दिवस अमृत महोत्सव के रूप में मनाने का आह्वाहन हुआ है । देश में धीरे - धीरे स्वतंत्रता के मायने बदले जा रहे है । लोगो को वैचारिक गुलाम बनाया जा चुका है । अस्थिर हो रहे समाज में आज वैचारिक रूप से आजाद कोई भी नहीं है, जो अपने आप को ईमानदारी के तराजू में तौल सके । किसी समाज के  ठेकेदार को जब कभी सामाजिक  मंच मिला है  तो वो बड़ी बड़ी आदर्श की बाते करने लगता है और फिर आड़ में वहीं व्यक्ति सर्वाधिक अनैतिक है ,  वैमनस्यता की पराकाष्ठा पार करके , वहीं लालच ,लोगो के अहित का विचार और अपनी सत्ता को एन केन प्रकारेन कायम करने कि जद्दो जहद उसमें सबसे ज्यादा परिलक्षित होती है  । इन सबके बीच अमर बलिदानी शहीदों के दिए कुर्बानी के बाद मिले स्वतंत्रता का उपयोग और उपभोग हम किस प्रकार कर रहे ये सर्वविदित है । हमनें सेंधमारी की है लोगो की निजता में , राजनीतिक दलों ने मानसिक गुलाम बनाया है लोगो को । जनता को वहीं दिखाया जाता है जो उसे पसंद आता है भले वो उसके हित में ना हो । जब किसी शहीद की शहादत दिखाई या सुनाई जाती है तो  समूचे देश में देशभक्ति की लहर उमड़ पड़ती है । 1857 का स्वाधीनता संग्राम जिसे सामान्य तौर पर भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, उसे पाठ्यपुस्तकों में बदलने की तैयारी की जा रही है । अब 1857 की क्रांति से पहले हुआ 1817 का पाइका विद्रोह पहला संग्राम माना जाएगा । 1857 का स्वाधीनता संग्राम जिसे सामान्य तौर पर भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम माना जाता है, उसे पाठ्यपुस्तकों में बदलने की तैयारी की जा रही है।  अब 1857 की क्रांति से पहले हुआ 1817 का पाइका विद्रोह पहला संग्राम माना जाएगा । केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा था कि 1817 के ओडिशा विद्रोह को अगले सत्र से इतिहास की पाठ्य पुस्तकों में 'प्रथम स्वतंत्रता संग्राम' के रुप में स्थान मिलेगा ।
           1817 में ओडिशा में हुए स्वतंत्रता विद्रोह ने पूर्वी भारत में कुछ समय के लिए ब्रिटिश राज की जड़े हिला दी थीं । मूल रूप से वह ओडिशा के उन गजपति शासकों के किसानों का असंगठित सैन्य दल था, जो युद्ध के समय राजा को सैन्य सेवाएं मुहैया कराते थे और शांतिकाल में खेती करते थे ।  इन लोगों ने 1817 में बक्शी जगबंधु बिद्याधर के नेतृत्व में ब्रिटिश राज के विरुद्ध बगावत का झंडा उठा लिया । खुर्दा के शासक परंपरागत रूप से जगन्नाथ मंदिर के संरक्षक थे और धरती पर उनके प्रतिनिधि के तौर पर शासन करते थे. वो ओडिशा के लोगों की राजनीतिक और सांस्कृतिक स्वतंत्रता का प्रतीक थे ।ब्रिटिश राज ने ओडिशा के उत्तर में स्थित बंगाल प्रांत और दक्षिण में स्थित मद्रास प्रांत पर अधिकार करने के बाद अंग्रेजों ने 1803 में ओडिशा को भी अपने अधिकार में कर लिया था । उस समय ओडिशा के गजपति राजा मुकुंददेव द्वितीय अवयस्क थे और उनके संरक्षक जय राजगुरु द्वारा किए गए शुरुआती प्रतिरोध का क्रूरता पूर्वक दमन किया गया और जयगुरु के शरीर के जिंदा रहते हुए ही टुकड़े कर दिए गए ।कुछ सालों के बाद गजपति राजाओं के असंगठित सैन्य दल के वंशानुगत मुखिया बक्शी जगबंधु के नेतृत्व में पाइका विद्रोहियों ने आदिवासियों और समाज के अन्य वर्गों का सहयोग लेकर बगावत कर दी । पाइका विद्रोह 1817 में आरंभ हुआ और बहुत ही तेजी से फैल गया ,हालांकि ब्रिटिश राज के विरुद्ध विद्रोह में पाइका लोगों ने अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन किसी भी मायने में यह विद्रोह एक वर्ग विशेष के लोगों के छोटे समूह का विद्रोह भर नहीं था । घुमसुर जो कि वर्तमान में गंजम और कंधमाल जिले का हिस्सा है, वहां के आदिवासियों और अन्य वर्गों ने इस विद्रोह में सक्रिय भूमिका निभाई. वास्तव में पाइका विद्रोह के विस्तार का सही अवसर तब आया, जब घुमसुर के 400 आदिवासियों ने ब्रिटिश राज के खिलाफ बगावत करते हुए खुर्दा में प्रवेश किया. खुर्दा, जहां से अंग्रेज भाग गए थे, वहां की तरफ कूच करते हुए पाइका विद्रोहियों ने ब्रिटिश राज के प्रतीकों पर हमला करते हुए पुलिस थानों, प्रशासकीय कार्यालयों और राजकोष में आग लगा दी ।पाइका विद्रोहियों को कनिका, कुजंग, नयागढ़ और घुमसुर के राजाओं, जमींदारों, ग्राम प्रधानों और आम किसानों का समर्थन प्राप्त था. यह विद्रोह बहुत तेजी से प्रांत के अन्य इलाकों जैसे पुर्ल, पीपली और कटक में फैल गया. विद्रोह से पहले तो अंग्रेज चकित रह गए, लेकिन बाद में उन्होंने आधिपत्य बनाए रखने की कोशिश की लेकिन उन्हें पाइका विद्रोहियों के कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा. बाद में हुई कई लड़ाइयों में विद्रोहियों को विजय मिली, लेकिन तीन महीनों के अंदर ही अंग्रेज अंतत: उन्हें पराजित करने में सफल रहे ।इसके बाद दमन का व्यापक दौर चला जिसमें कई लोगों को जेल में डाला गया और अपनी जान भी गंवानी पड़ी. बहुत बड़ी संख्या में लोगों को अत्याचारों का सामना करना पड़ा. कई विद्रोहियों ने 1819 तक गुरिल्ला युद्ध लड़ा, लेकिन अंत में उन्हें पकड़ कर मार दिया गया. बक्शी जगबंधु को अंतत: 1825 में गिरफ्तार कर लिया गया और कैद में रहते हुए ही 1829 में उनकी मृत्यु हो गई । शहीदों के साहसिक योगदान को अमर करने के लिए गीत रचे गए और उनका बलिदान लोकगीतों के रूप में मुखरित हुआ। उनके सम्मान में भावपूर्ण गीतों की रचना हुई जिन्हें देश  के लोक गायक आज भी गाते हैं। ऐसे ही दो पंक्तियां ये कि - शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ,वतन पर जां देने वालों की यही आखिरी नीशा होंगी ।
        आज की युवा पीढ़ी की ओर देखता  हूं तो मुझे  वह जज्बा दिखाई नहीं देता, जो खुदीराम बोस , भगत सिंह , चन्द्र शेखर आजाद  और प्रफुल्ल चाकी जैसे असंख्य क्रांतिकारियों में था। आजाद 
भारत की सरकारों ने भी ऐसा कुछ नहीं किया, जिससे क्रांतिकारियों के विचारों से समकालीन पीढ़ी ठीक से अवगत हो सके। या कहें की जान बुझकर उन्हें अपने देश के अमर क्रांतिकारियों के जीवन से परिचित नहीं कराया गया और उन्होंने भी अंग्रेजों वाली नीति का ही अनुसरण करते हुए ऐसी शिक्षा व्यवस्था 
को ही लागू रहने दिया जो भारत को भारत में ही भारत से नहीं जोड़ती । यह इसलिए भी किया हो सकता हैं ताकि देश में कभी कोई भी क्रन्तिकारी परिवर्तन के लिए आवाज़ ही न उठे और सभी सरकारी हुक्मरान अपनी अपनी  देश बेचों नीतियों में लिप्त रहें और उन्हें कोई भी कुछ भी पूछने की हिम्मत न कर सके ,हमारी सस्कृति ,जीवन मूल्यों संस्करों के प्रति हमारी शिक्षा व्यवस्था बहुत ही नीरस है हमारे देश का युवा अपने ऐतिहासिक गौरवशाली अतीत के बारे में कुछ जनता ही नहीं है जिस भारत भूमि में वो रह रहा है उसके लिए कितने  वीरों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया उसे पता ही नहीं है ।महज़ चंद नामचीन...शहीदों की जयंतियों और पुण्यतिथियों पर उनकी मूर्तियों पर फूलमालाएं चढाने को ही शहीदों का सम्मान मान लिया गया है। ज्यादा हुआ,  तो कहीं उनके नाम पर सडक का नामकरण कर दिया गया या किसी चौक चौराहे पर उनकी मूर्ति का अनावरण कर दिया यही है हमारा शहीदों के प्रति सम्मान  दर्शाने का तरीका है ।  भारत छोड़ो आंदोलन की 79वीं सालगिरह है। इसी दिन ठीक 79 साल पहले मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान में गांधी जी ने करो या मरो का सन्देश दिया था। इसके पहले आठ अगस्त की रात को कांग्रेस ने भारत छोड़ो का प्रस्ताव पारित किया था। यहां यह बताना जरूरी है कि भारत छोड़ो का नारा कांग्रेस में सक्रिय समाजवादी नेता युसूफ मेहर अली के दिमाग की उपज था। यही युसूफ मेहर अली बाद में मुंबई के मेयर रहे। उन्होंने ही युसूफ मेहर अली ने ही साइमन गो बैक का भी नारा दिया था। मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान को अब आजाद पार्क के नाम से जाना जाता है।इस आंदोलन की तासीर ऐसी थी कि इसकी आंच में जलते हुए उ.प्र. का बलिया 18 अगस्त 1942 को आजाद हो गया था। तब बलिया में चित्तू पांडे ने पहली सरकार बनाई थी। इसी तरह प. बंगाल के मिदिनापुर में भी देसी सरकार बनी और महाराष्ट्र का सतारा भी स्वतंत्र हो गया था। बाद में अंग्रेजी सेनाओं ने तीनों जगहों पर फिर कब्जा किया। भारत छोड़ो आंदोलन की वजह से अंग्रेज सरकार के पांव उखड़ गए और पांच साल बाद उन्हें अपना बोरिया-बिस्तर समेट कर यहां से जाना पड़ा ऐसे शहीदों के साथ ही नहीं इस देश के अनेकों क्रांतिकारियों के साथ भी यही हुआ है, जबकि जरूरत थी, उनके विचारों के प्रसार की, उनसे प्रेरणा लेने की। उनको आत्मसात करने की ..जो हम नहीं कर पायें ! आज हमें जरूरत है उस मंत्र की जिसमे कहा गया है - 
जो भरा नहीं है भावों से , जिसमें बहती रसधार नहीं । वह हृदय नहीं वह पत्थर है जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं ।।
             -- पंकज कुमार मिश्रा एडिटोरियल कॉलमिस्ट शिक्षक एवं पत्रकार केराकत जौनपुर ।


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