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महाशय धर्मपाल गुलाटी : 93 साल का जिंदादिल व्यक्तित्व

03-12-2020 11:29:47 AM

1933 में उन्होंने स्कूल छोड़ दिया और अपने पिता की मदद से नया कारोबार शुरू करने की कोशिश करने लगे. खुद अपनी आत्मकथा में वो कहते हैं कि उन्होंने 'पौने पांच क्लास तक की' ही पढ़ाई की है.

उन्होंने पिता की मदद से आईनों की दुकान खोली, फिर साबुन और फिर चावल का कारोबार किया. लेकिन इन कामों में मन नहीं लगने पर बाद में वो अपने पिता के मसालों के कारोबार में हाथ बंटाने लगे.

1947 को आज़ादी मिली और देश का विभाजन हुआ. धर्मपाल के माता-पिता ने पाकिस्तान छोड़ दिल्ली आने का फ़ैसला किया और 27 सितंबर 1947 में ये परिवार दिल्ली पहुंचा.

उस दौरान जो पैसे उनके पास थे उसे धर्मपाल ने एक तांगा खरीदा और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से कुतुब रोड तक और करोल बाग़ से बाड़ा हिंदू राव तक तांगा चलाने लगे.

जल्द ही करोल बाग़ में उन्होंने 'महशियान दी हट्टी' के नाम से ही फिर से अपना पुराना मसालों का कारोबार शुरू किया. वो सूखे मसाले खरीद कर उन्हें पीस कर बाज़ार में बेचते थे.

ये कारोबार अब पूरे देश-विदेश में फैल चुका है. 93 साल पुरानी ये कंपनी अब भारत के साथ-साथ यूरोप, जापान, अमेरिका, कनाडा और सऊदी अरब में अपने मसाले बेचती है. कंपनी का कारोबार 1500 करोड़ रुपये से ज़्यादा का बताया जाता है।


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